एचपीयू में भर्ती प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं* के *आरोपों को लेकर एसएफआई का रजिस्ट्रार कार्यालय घेराव

हिम न्यूज़, शिमला :स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI), हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने आज विश्वविद्यालय में भर्ती प्रक्रिया मे अनियमितताओं, नियमों की अवहेलना तथा भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठ रहे गंभीर सवालों को लेकर रजिस्ट्रार कार्यालय का घेराव किया तथा रजिस्ट्रार के माध्यम से माननीय कुलपति को दो विस्तृत ज्ञापन सौंपे। एसएफआई ने मांग की कि विज्ञापन संख्या Rectt. 17/2019 दिनांक 30.12.2019 के अंतर्गत हुई दो नियुक्तियों की किसी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष एजेंसी अथवा उच्च स्तरीय समिति से समयबद्ध जांच करवाई जाए और यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता सिद्ध होती है तो संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

 एसएफआई नेताओं ने कहा कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय प्रदेश की सर्वोच्च उच्च शिक्षण संस्थाओं में से एक है, जहां होने वाली प्रत्येक नियुक्ति हजारों योग्य एवं प्रतिभाशाली युवाओं के भविष्य से जुड़ी होती है। ऐसे में विश्वविद्यालय का संवैधानिक एवं नैतिक दायित्व है कि प्रत्येक भर्ती प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी, निष्पक्ष, विधिसम्मत तथा समान अवसर के सिद्धांतों पर आधारित हो। लेकिन उपलब्ध अभिलेख ऐसे गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि विश्वविद्यालय के अपने निर्धारित नियमों की अवहेलना कर कुछ अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया हो सकता है। एसएफआई ने कहा कि इन्हीं तथ्यों के आधार पर विस्तृत ज्ञापन प्रस्तुत किया गया है।

एसएफआई ने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा जारी विज्ञापन में ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि 30 जनवरी 2020 तथा आवेदन की हार्ड कॉपी एवं आवश्यक दस्तावेज जमा करवाने की अंतिम तिथि 15 फरवरी 2020 निर्धारित की गई थी। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय ने अपने पत्र संख्या 3-2/2009-HPU(Rectt.) दिनांक 26 अक्टूबर 2020 के माध्यम से स्पष्ट किया था कि केवल वही प्रमाण-पत्र, शोध प्रकाशन एवं अन्य दस्तावेज मान्य होंगे जो ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि 30 जनवरी 2020 तक अस्तित्व में आ चुके हों। यदि विश्वविद्यालय के अपने नियम इतने स्पष्ट थे, तो फिर इन नियमों का पालन सभी अभ्यर्थियों पर समान रूप से क्यों नहीं किया गया—यह सबसे बड़ा प्रश्न है।

एसएफआई  सचिव मुकेश ने पहले मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि यूआईआईटी में सहायक आचार्य (सिविल इंजीनियरिंग) के पद पर नियुक्ति से संबंधित उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार संबंधित अभ्यर्थी की आवेदन की हार्ड कॉपी विश्वविद्यालय में 24 फरवरी 2020 को प्राप्त हुई, जबकि अंतिम तिथि 15 फरवरी 2020 निर्धारित थी। संगठन ने प्रश्न उठाया कि जब आवेदन निर्धारित समय सीमा के बाद प्राप्त हुआ, तब उसे तत्काल निरस्त क्यों नहीं किया गया? किस अधिकारी ने, किस आदेश और किस नियम के तहत विलंब से प्राप्त आवेदन को स्वीकार कर चयन प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति दी? यदि किसी एक अभ्यर्थी को नियमों से छूट दी गई, तो क्या यही सुविधा अन्य सभी अभ्यर्थियों को भी उपलब्ध कराई गई थी?

एसएफआई ने आगे कहा कि उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार संबंधित अभ्यर्थी को शोध प्रकाशनों के आधार पर 10 में से 8 अंक प्रदान किए गए, जबकि जिन शोध पत्रों के आधार पर ये अंक दिए गए, वे 3 फरवरी 2020 तथा 10 फरवरी 2020 को प्रकाशन हेतु स्वीकृत हुए, अर्थात ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि के बाद अस्तित्व में आए। जबकि विश्वविद्यालय स्वयं यह स्पष्ट कर चुका था कि अंतिम तिथि के बाद अस्तित्व में आए किसी भी दस्तावेज को स्वीकार नहीं किया जाएगा। ऐसे में इन शोध पत्रों को स्वीकार कर अंक प्रदान किए जाने का आधार सार्वजनिक किया जाना चाहिए। एसएफआई ने कहा कि यह भी जांच का विषय है कि क्या इन अतिरिक्त अंकों के कारण अन्य अधिक योग्य एवं पीएच.डी. धारक अभ्यर्थियों की वरीयता प्रभावित हुई।

दूसरे मामले में एसएफआई ने आईसीडीईओएल में एसोसिएट प्रोफेसर (हिन्दी) के पद पर ओबीसी आरक्षित श्रेणी के अंतर्गत हुई नियुक्ति पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार आवेदन की हार्ड कॉपी निर्धारित समय के भीतर प्राप्त हुई थी, लेकिन भर्ती अभिलेखों में संलग्न ओबीसी प्रमाण-पत्र 25 दिसंबर 2020 को जारी होना दर्शाया गया है, जो आवेदन की अंतिम तिथि से लगभग ग्यारह माह बाद का है। यदि यह तथ्य सही है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि क्या संबंधित अभ्यर्थी के पास आवेदन की अंतिम तिथि तक वैध ओबीसी प्रमाण-पत्र उपलब्ध था। यदि नहीं, तो विश्वविद्यालय ने अपने ही भर्ती नियमों के विपरीत जाकर आरक्षित वर्ग का लाभ किस आधार पर प्रदान किया? यदि किसी प्रकार की विशेष छूट दी गई थी, तो उसका वैधानिक आधार सार्वजनिक किया जाए।

एसएफआई ने कहा कि ये दोनों मामले प्रथम दृष्टया विश्वविद्यालय की भर्ती प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं की ओर संकेत करते हैं और इनकी निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है। यदि अंतिम तिथि के बाद प्राप्त आवेदन तथा अंतिम तिथि के बाद अस्तित्व में आए दस्तावेजों को भी स्वीकार किया जाएगा, तो भर्ती नियमों एवं अंतिम तिथि का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इससे योग्य अभ्यर्थियों के संवैधानिक अधिकार तथा समान अवसर के सिद्धांत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

संगठन ने मांग की कि दोनों नियुक्तियों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष एजेंसी अथवा उच्च स्तरीय समिति से समयबद्ध जांच करवाई जाए, भर्ती प्रक्रिया से संबंधित सभी अभिलेखों का परीक्षण किया जाए, नियमों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए तथा यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता, पक्षपात, कदाचार, दस्तावेजों की अवैध स्वीकृति अथवा भ्रष्टाचार सिद्ध होता है, तो संबंधित अधिकारियों एवं लाभार्थियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर कानूनी एवं विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

अंत में एसएफआई ने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं है। यह संघर्ष योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों, विश्वविद्यालय की गरिमा, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था तथा भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन की स्थापना के लिए है। संगठन ने कहा कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा तभी सुरक्षित रह सकती है जब नियम सभी पर समान रूप से लागू हों, दोषियों को संरक्षण न मिले तथा प्रत्येक नियुक्ति केवल योग्यता, पारदर्शिता और विधि के आधार पर हो। एसएफआई ने चेतावनी दी कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में शीघ्र एवं निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करता, तो संगठन छात्र हितों और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था की मांग को लेकर अपना आंदोलन और व्यापक करेगा।