पारंपरिक ज्ञान (IKS) और आधुनिक तकनीक के समन्वय से भारत को ज्ञान महाशक्ति बनाने पर जोर

हिम न्यूज़  धर्मशाला। Association of Indian Universities के 100वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन D Y Patil University, पुणे में किया गया, जिसमें देशभर के लगभग 400 कुलपतियों ने भाग लिया। सम्मेलन का मुख्य विषय “पाठ्यक्रम एवं अनुसंधान में पारंपरिक ज्ञान (IKS) और नई तकनीक का एकीकरण” रहा, जो स्नातक (UG) एवं स्नातकोत्तर (PG) स्तर की शिक्षा में भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।

सम्मेलन के एक प्रमुख एवं व्यापक रूप से सराहे गए सत्र की अध्यक्षता Prof. Sat Prakash Bansal ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को उभरती हुई आधुनिक तकनीकों के साथ प्रभावी ढंग से जोड़ना उच्च शिक्षा के पुनर्परिभाषण के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस प्रकार का समन्वय न केवल शैक्षणिक गुणवत्ता को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में भारत की अग्रणी भूमिका सुनिश्चित करेगा।

प्रो. बंसल ने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं है, बल्कि विज्ञान, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक विज्ञान जैसे विभिन्न क्षेत्रों में आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स तथा डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ IKS का एकीकरण शिक्षा को अधिक समग्र, नवाचार-उन्मुख और प्रभावी बना सकता है।

उन्होंने जानकारी दी कि Central University of Himachal Pradesh ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं। विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय ज्ञान प्रणाली पर आधारित पुस्तकों का प्रकाशन किया जा रहा है, जिससे शैक्षणिक संसाधनों को सुदृढ़ किया जा सके। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापनों (MoUs) के माध्यम से सहयोगात्मक अनुसंधान और शैक्षणिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जा रहा है।

उन्होंने यह भी बताया कि CUHP में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय पर आधारित विशेष पाठ्यक्रम एवं शोध ढांचे विकसित किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उल्लेख करते हुए प्रो. बंसल ने इसे एक परिवर्तनकारी नीति बताया, जो पारंपरिक ज्ञान को मुख्यधारा की उच्च शिक्षा में शामिल करने के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करती है।उन्होंने विश्वविद्यालयों से आग्रह किया कि वे UG और PG स्तर पर ऐसे कार्यक्रम विकसित करें, जो प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करें तथा विद्यार्थियों में नवाचार, समालोचनात्मक सोच और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा दें।

इस सत्र में अन्य विशिष्ट वक्ताओं—Dr. Atul Kothari, Prof. Shashi Kala Wanjari, Prof. Shrinivas Varakhedi तथा Prof. Kumar Molugaram—ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान में एकीकृत करना समय की मांग है।

सत्र के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म, वर्चुअल प्रयोगशालाओं और ई-लर्निंग टूल्स की भूमिका पर भी विशेष रूप से चर्चा की गई, जो भारतीय ज्ञान प्रणाली को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक सुलभ और प्रभावी बनाने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
इस सत्र को Prof. Vinay Pathak ने अत्यंत प्रासंगिक एवं दूरदर्शी बताते हुए सराहा। वहीं Prof. Pankaj Mittal ने कहा कि सत्र से प्राप्त अनुशंसाओं को भारत सरकार को नीति-निर्माण हेतु प्रस्तुत किया जाएगा।

अपने समापन वक्तव्य में प्रो. बंसल ने कहा कि भारत की पारंपरिक ज्ञान विरासत और आधुनिक तकनीकी क्षमताओं का समन्वय एक नई शैक्षिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि रणनीतिक क्रियान्वयन और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से भारत निकट भविष्य में एक अग्रणी वैश्विक ज्ञान महाशक्ति के रूप में स्थापित होगा।