हिम न्यूज़, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय एक सार्वजनिक संस्थान है, जिसकी स्थापना आसान और उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए की गई थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रों और उनके परिजनों पर पहले से ही भारी आर्थिक भार पड़ता है। जिस समय भर्ती, मोटरसाइकिल, प्रवेश, वित्तीय प्रबंधन, निर्माण कार्य और सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं, ऐसे में शुल्क वृद्धि के माध्यम से अतिरिक्त आर्थिक सामान पूरी तरह से अनुचित है। एसएफआई का दृढ़ विश्वास है कि सरकारी विफलताओं, वित्तीय कुप्रबंधन या विश्वविद्यालय के अंदर प्रमाणित शेयरधारकों की कीमत छात्रों से नहीं होनी चाहिए।
1. शुल्क वृद्धि तत्काल वापस ली जाए:
एसएफआईएफ शुल्क वृद्धि को स्वचालित रूप से वापस लेने की मांग करता है। शुल्क वृद्धि से पहले विश्वविद्यालय प्रशासन को अपनी आय, व्यय, अनुदान, छात्र-छात्र संग्रह, भर्ती व्यय, निर्माण व्यय और निधियों के उपयोग का विवरण विवरण छात्रों के सामने रखना चाहिए। जब भी यूनिवर्सिटी फाइनेंसियल कंसल्टेंसी का सामना करती है, तो छात्रों को अतिरिक्त आय का आसान स्रोत नहीं दिया जा सकता है। एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय की वित्तीय वित्तीय स्थिति का समाधान बार-बार छात्रों पर आर्थिक भार नहीं डाला जा सकता है।
2. सभी अवैध नियुक्तियों की स्वतंत्र ऐतिहासिक ऐतिहासिक इमारतों की जाये:
2020-23 के बीच 186 नियुक्तियों की, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में ईडब्ल्यूएससी प्रमाणपत्रों, शैक्षणिक योग्यताओं और अन्य सहायक दस्तावेजों के सत्यापन के लिए आवेदकों, स्वतंत्र, सहयोगियों और समयबद्ध जांच की आवश्यकता है। एसएफआई किसी ऐसी जांच की मांग नहीं करता है, बल्कि एक स्वतंत्र स्थापत्य प्रयोगशाला के नेतृत्व में निरपेक्ष जांच की मांग करता है, न कि एक ही मेट्रिक्स द्वारा नियंत्रित जांच की, आईएसआईएस निर्णय-प्रक्रिया स्वयं जांच की मांग में है। यदि किसी भी कंपनी के लागू होने का उल्लंघन पाया जाता है, तो कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
3. जब हितों का शत्रु स्पष्ट हो, तब आंतरिक समिति क्यों?
यूनिवर्सिटी ने मामले की जांच के लिए एक आंतरिक समिति बनाई है। लेकिन एसएफआई ने यह प्रश्न उठाया है कि ऐसी विश्वसनीय समिति क्या हो सकती है, यदि उसके सदस्य, असिस्टेंस उसके अध्यक्ष, स्वयं 2016 में सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए हों और उसी एपीआई के आधार पर 2016 में ही प्रोफेसर पद पर नियुक्त हुए हों। आश्चर्यजनक? यदि जांच का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति स्वयं अपनी फिल्मों और मसालों से संबंधित वस्तुओं का सामना कर रहा हो, तो सामान्य छात्र पूर्ण स्वतंत्रता और सहायक की योग्यता कैसे प्राप्त करें? एक स्वतंत्र मिस्रवासी पुरातत्वविद् को एसईसी जांच जांच की मांग की जाती है।
4. सभी विश्वविद्यालयों की योग्यता और अनुभव की जांच हो:
एसएफआई संबंधित अवधि में नियुक्त सभी एसोसिएट्स की योग्यता, अनुभव और योग्यता की व्यापक जांच की मांग करता है। इस जांच में नियमों का पालन करने का प्रमाण-पत्र शामिल होना चाहिए। हर ढांचे पर समान मानक के बिना किसी पूर्वाग्रह, भेदभाव या अपवाद के लागू होना चाहिए।
5. सभी CAS सहयोगियों की समीक्षा हो:
संबंधित अवधि में कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (सीएएस) के अंतर्गत सभी संबद्ध व्यक्तियों की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए। विश्वविद्यालय को प्रत्येक कोचिंग के लिए पात्रता, शिक्षण/अनुसंधान अनुभव, एपीआई/शैक्षणिक प्रदर्शन स्कोर, प्रकाशन, सेवा-अभिलेख और अन्य शैक्षणिक योग्यता का विवरण देना चाहिए। यदि कोई वर्गीकृत वर्गीकृत अनुभव, एपीआई बिंदु की गलत गणना या अन्य छात्रों के आधार पर दिया गया है, तो जिम्मेदारी तय की जाए और कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
6. त्यागपत्र देने वाले शिक्षक को पूर्व प्रभाव से रेलवे कैसे मिली?
एसएफआई उन मामलों पर स्पष्ट स्पष्टीकरण चाहती है, जिनमें किसी शिक्षक ने कथित रूप से HPU से त्यागपत्र दिया, किसी अन्य संस्थान में कार्यभार ग्रहण किया, और बाद में HPU में CAS पदोन्नति के लिए विचार किया गया। यदि ऐसे व्यक्ति का साक्षात्कार लेकर पूर्व प्रभाव से पदोन्नति की गई और HPU के धन से भारी वित्तीय लाभ दिए गए, तो विश्वविद्यालय को उस निर्णय का कानूनी और नियामक आधार सार्वजनिक करना चाहिए। किसने प्रक्रिया को अधिकृत किया, किसने पात्रता सत्यापित की और किसने वित्तीय दायित्व को मंजूरी दी? सार्वजनिक धन का प्रत्येक रुपया ठीक से हिसाब में होना चाहिए।
7. NGO अनुभव को मनमाने ढंग से स्वीकार नहीं किया जा सकता:
एसएफआई ने उन मामलों पर प्रश्न उठाए हैं जहाँ एनजीओ से प्राप्त अनुभव को भर्ती या CAS पदोन्नति में विचार किया गया। विश्वविद्यालय को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या ऐसा अनुभव लागू यूजीसी विनियमों और विश्वविद्यालय नियमों के तहत स्वीकार्य था। यदि किसी पद या पदोन्नति के लिए वह अनुभव स्वीकार्य नहीं था, तो जिन अभ्यर्थियों के पास वास्तविक और मान्य अनुभव है, उन्हें अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता जबकि अमान्य अनुभव को अन्य के लिए स्वीकार किया जाए। भर्ती और पदोन्नति के मानदंड समान, पारदर्शी और नियम-आधारित होने चाहिए।
8. कोविड-19 प्रतिबंधों के दौरान साक्षात्कार क्यों आयोजित किए गए?
एसएफआई कोविड-19 प्रतिबंधों की अवधि में आयोजित साक्षात्कारों और चयन-संबंधी प्रक्रियाओं पर स्पष्टीकरण मांगती है। विश्वविद्यालय को उन तारीखों, अनुमतियों, परिस्थितियों और कारणों का खुलासा करना चाहिए, जिनके आधार पर इन प्रक्रियाओं को उस समय अत्यावश्यक माना गया, जब सामान्य शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियाँ गंभीर रूप से सीमित थीं। यदि प्रक्रिया को छात्रों को प्रभावित किए बिना टाला जा सकता था, तो इसे असाधारण परिस्थितियों में क्यों कराया गया? पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
9. प्रत्यक्ष एसोसिएट प्रोफेसर नियुक्तियों के लिए आठ वर्ष के अनुभव की पुष्टि हो:
186 नियुक्तियों में से कई कथित रूप से सीधे एसोसिएट प्रोफेसर पद पर की गई थीं। एसएफआई मांग करती है कि प्रत्येक ऐसे नियुक्त व्यक्ति की निर्धारित योग्यता और आवश्यक प्रासंगिक अनुभव की जांच की जाए, जैसा कि लागू यूजीसी विनियमों, विशेषकर 2010 और 2018 के यूजीसी विनियमों, जहाँ लागू हों, में निर्धारित है। किसी भी व्यक्ति को बिना अनिवार्य पात्रता मानदंडों को पूरा किए वरिष्ठ शैक्षणिक पद नहीं दिया जाना चाहिए।
10. कुलपति ने कार्यकारी परिषद की नियुक्ति-शक्ति का प्रयोग कैसे किया?
एसएफआई विश्वविद्यालय में नियुक्ति-संबंधी शक्तियों के प्रयोग पर पूर्ण स्पष्टीकरण चाहती है। H.P. University Act, 1970 और विश्वविद्यालय संविधान/Statutes में कार्यकारी परिषद की शक्तियों और कार्यों का प्रावधान है, जिसमें शिक्षण पदों का सृजन और विधिवत गठित चयन समितियों की सिफारिशों पर नियुक्ति शामिल है, जैसा कि उसी विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 11(i) में है। तत्कालीन कुलपति ने इन शक्तियों को कैसे हड़प लिया, जबकि ये अन्य शक्तियाँ विश्वविद्यालय के कुलपति की आपातकालीन शक्तियों (धारा 12-C(7)) के अंतर्गत भी नहीं आतीं? यह गंभीर भ्रष्टाचार है।
11. भर्ती में गेस्ट फैकल्टी अनुभव के उपयोग की जांच हो:
एसएफआई उन मामलों की जांच की मांग करती है जहाँ गेस्ट फैकल्टी के अनुभव को भर्ती या पदोन्नति में मान्यता दी गई। विश्वविद्यालय को यह जांचना चाहिए कि जिन परिस्थितियों में यह अनुभव, जो यूजीसी विनियमों के अनुसार गण्य नहीं है, उसे कथित रूप से धोखाधड़ीपूर्ण नियुक्तियाँ करने के लिए कैसे माना गया।
12. सभी ईडब्ल्यूएस, ओबीसी और अन्य आरक्षण प्रमाणपत्रों का सत्यापन हो:
भर्ती के दौरान प्रस्तुत सभी ईडब्ल्यूएस, ओबीसी और अन्य आरक्षण श्रेणी के प्रमाणपत्रों का सत्यापन सीधे सक्षम जारीकर्ता प्राधिकरणों से किया जाना चाहिए। कोई भी प्रमाणपत्र जो जाली, अमान्य, हेरफेर किया हुआ या अनुचित रूप से जारी पाया जाए, उसे उचित प्राधिकरण को जांच और कानूनी कार्रवाई के लिए भेजा जाए। आरक्षण लाभ वास्तविक पात्र उम्मीदवारों तक ही पहुंचना चाहिए और इसे धोखाधड़ीपूर्ण नियुक्तियों का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता।
13. कथित UGC-NET छूट प्रमाणपत्रों की जांच हो:
एसएफआई संबंधित अवधि में जारी किए गए UGC-NET छूट प्रमाणपत्रों से संबंधित आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग करती है, विशेषकर जहाँ ऐसी छूट M.Phil. और Ph.D. योग्यताओं को नियंत्रित करने वाले लागू यूजीसी विनियमों के विपरीत रही हो सकती है। विश्वविद्यालय को यह बताना चाहिए कि ऐसे प्रमाणपत्र किसने, किस प्राधिकरण के तहत, किस विनियम के अंतर्गत जारी किए, और क्या किसी उम्मीदवार ने बाद में इन प्रमाणपत्रों के आधार पर प्रवेश, भर्ती या पदोन्नति का लाभ लिया।
14. भर्ती और पीएच.डी. प्रवेश में हितों के टकराव की जांच हो:
एसएफआई उन मामलों में जांच की मांग करती है, जहाँ चयन, प्रवेश या अन्य महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय समितियों के सदस्य अपने जीवनसाथी, रिश्तेदारों या निकट सहयोगियों से संबंधित प्रक्रियाओं में शामिल रहे हों। किसी भी पक्षपातपूर्ण भर्ती या प्रवेश के आरोप की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। एक पारदर्शी संस्था भर्ती और शैक्षणिक प्रवेश में हितों के टकराव के केवल आभास को भी स्वीकार नहीं कर सकती।
15. UIIT को केवल शुल्क वसूली मशीन नहीं माना जा सकता:
University Institute of Information Technology (UIIT) लगभग 26 वर्षों से कार्यरत है। यदि UIIT छात्र-शुल्क के माध्यम से लगभग 18–20 करोड़ रुपये वार्षिक उत्पन्न कर रहा है, तो विश्वविद्यालय को इस धन के उपयोग का पूरा और पारदर्शी हिसाब देना चाहिए। इतनी बड़ी शुल्क वसूली के बावजूद छात्र प्रयोगशालाओं, पुस्तकालय संसाधनों, छात्रावास और अन्य बुनियादी ढांचे जैसी सुविधाओं की कमी उठा रहे हैं। छात्रों का पैसा कहाँ गया? एसएफआई UIIT के समग्र वित्तीय और अवसंरचनात्मक ऑडिट तथा आय-व्यय के पूर्ण खुलासे की मांग करती है।
16. ITEP: पर्याप्त सुविधाओं के बिना छात्रों को प्रवेश नहीं दिया जा सकता:
एसएफआई चार वर्षीय Integrated Teacher Education Programme (ITEP) के आरंभ पर पारदर्शी स्पष्टीकरण मांगती है। यदि छात्रों का प्रवेश हुआ है और शुल्क लिया गया है, तो विश्वविद्यालय को दिखाना होगा कि आवश्यक बुनियादी ढांचा, समर्पित संकाय, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ, छात्रावास और अन्य शैक्षणिक सुविधाएँ उपलब्ध थीं। NEP 2020 का उपयोग पर्याप्त तैयारी के बिना कार्यक्रम शुरू करने के बहाने के रूप में नहीं किया जा सकता। छात्रों से ऐसे कार्यक्रम का शुल्क लेकर उन्हें उसके लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता।
17. निर्माण परियोजनाओं और टेंडरिंग की जांच हो:
एसएफआई प्रमुख निर्माण परियोजनाओं और टेंडरिंग प्रक्रियाओं का स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय ऑडिट चाहती है। पुराने JMC और Geography Block स्थल पर निर्मित एक भवन के संबंध में प्रश्न उठाए गए हैं, जहाँ मूल DPR कथित रूप से लगभग 6 करोड़ रुपये का था, जबकि अंतिम व्यय लगभग 12 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। विश्वविद्यालय को वृद्धि के कारण, संशोधित DPR, स्वीकृतियाँ, टेंडर प्रक्रिया, अतिरिक्त व्यय और प्रत्येक चरण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जानकारी देनी चाहिए। सार्वजनिक धन का उपयोग सार्वजनिक जवाबदेही के बिना नहीं किया जा सकता।
18. लिफ्टें वर्षों से निर्माणाधीन क्यों हैं?
Arts Block, Science Blocks और अन्य स्थानों पर लिफ्टें कथित रूप से कई वर्षों से निर्माणाधीन हैं। एसएफआई स्वीकृत राशि, व्यय, ठेकेदार का विवरण, देरी के कारण और अपेक्षित पूर्णता तिथियों के खुलासे की मांग करती है। सुगमता एक मूलभूत आवश्यकता है, विशेषकर दिव्यांग व्यक्तियों के लिए। विश्वविद्यालय को आवश्यक बुनियादी ढांचे को वर्षों तक अधूरा छोड़ने के बजाय पहुंच और सामाजिक-न्याय संबंधी दायित्वों का पालन करना चाहिए।
19. आधिकारिक सजावट के लिए अनुदानों के दुरुपयोग को रोका जाए:
विश्वविद्यालय अनुदानों का उपयोग मुख्यतः शैक्षणिक विकास, प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, छात्रावास, कक्षाएँ, छात्र कल्याण और अन्य आवश्यक शैक्षणिक बुनियादी ढांचे के लिए होना चाहिए। एसएफआई विश्वविद्यालय अधिकारियों के कार्यालयों की अनावश्यक निर्माण, नवीनीकरण और सजावट पर होने वाले खर्च पर प्रश्न उठाती है, जबकि छात्र मूलभूत सुविधाओं की कमी झेल रहे हैं। छात्रों की शैक्षिक आवश्यकताएँ अधिकारियों के कार्यालयों की सुंदरता से पहले होनी चाहिए।
20. पीएच.डी. प्रवेश को पारदर्शी बनाया जाए:
एसएफआई पीएच.डी. प्रवेश प्रक्रिया की व्यापक समीक्षा की मांग करती है, विशेषकर इस बात पर कि साक्षात्कार के अंक कैसे दिए जा रहे हैं। यदि UGC-JRF योग्य और मजबूत शैक्षणिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा, जबकि कमजोर योग्यता वाले उम्मीदवार चुने जा रहे हैं, तो विश्वविद्यालय को चयन का आधार स्पष्ट करना चाहिए। साक्षात्कार के अंक शैक्षणिक योग्यता को विफल करने का उपकरण नहीं बन सकते। चयन के पूर्ण मानदंड, अंक और मेरिट सूची सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
21. सभी शैक्षणिक केंद्रों और विभागों को समान व्यवहार मिले:
एसएफआई Green Technology, Nano-Technology और अन्य पसंदीदा क्षेत्रों से जुड़े कुछ चुने हुए केंद्रों पर कथित असमान फोकस पर प्रश्न उठाती है, जबकि कई स्थापित विभागों में संकाय और बुनियादी ढांचे की भारी कमी बनी हुई है। शैक्षणिक संसाधनों का आवंटन छात्र आवश्यकता, शिक्षण कार्यभार, शोध आवश्यकताओं और संस्थागत प्राथमिकताओं के अनुसार होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत पसंद के आधार पर। हर विभाग और हर छात्र को समान संस्थागत ध्यान मिलना चाहिए।
22. जहाँ नियमित संकाय उपलब्ध हो, वहाँ गेस्ट फैकल्टी क्यों?
जहाँ नियमित संकाय पहले से उपलब्ध हैं और शिक्षण कार्यभार संभालने में सक्षम हैं, वहाँ विश्वविद्यालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि गेस्ट फैकल्टी क्यों रखी जा रही है। एसएफआई मांग करती है कि विश्वविद्यालय विभागवार स्वीकृत पद, भरे हुए पद, रिक्तियाँ, कार्यभार, नियुक्त गेस्ट फैकल्टी और उन पर होने वाला व्यय सार्वजनिक करे। गेस्ट फैकल्टी का उपयोग तर्कसंगत और पारदर्शी संकाय नियोजन के विकल्प के रूप में नहीं होना चाहिए।
23. गंभीर आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को विश्वविद्यालय की जिम्मेदारियाँ क्यों मिलती रहें?
एसएफआई ने एक ज्ञापन सौंपा है और एक पूर्व रजिस्ट्रार तथा कार्यकारी परिषद और अन्य वैधानिक निकायों द्वारा कथित रूप से अनुमोदित एक भर्ती विज्ञापन से संबंधित अनियमितताओं की जांच की मांग पर आधिकारिक डायरी/रसीद प्राप्त की है। इसलिए एसएफआई ऐसे व्यक्तियों को, जिन पर गंभीर आरोप लंबित हैं, निरीक्षण या विशेषज्ञ कार्य सहित महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय जिम्मेदारियाँ लगातार दिए जाने पर प्रश्न उठाती है। सही तरीका यह है कि पहले आरोपों की जांच की जाए और जवाबदेही तय की जाए, न कि प्रश्नों के घेरे में आए व्यक्तियों को बार-बार पुरस्कृत किया जाए या जिम्मेदारी दी जाए।
24. विभागाध्यक्ष/अध्यक्षों की नियुक्ति में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए:
एसएफआई विभिन्न विभागों में Chairpersons/Heads की कथित असंगत नियुक्ति पर प्रश्न उठाती है। यदि एक विभाग में एक सहायक प्रोफेसर को अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जा सकती है, जबकि दूसरे विभाग में बाहरी व्यक्ति को ऐसी जिम्मेदारी दी जाती है, तो विश्वविद्यालय को इन निर्णयों का मानदंड और वैधानिक आधार स्पष्ट रूप से बताना चाहिए। शैक्षणिक नेतृत्व क्षमता, संस्थागत आवश्यकता और पारदर्शी मानदंडों पर आधारित होना चाहिए — न कि व्यक्तिगत निष्ठा या चापलूसी पर।
25. जहाँ छात्र संकाय की कमी से पीड़ित हैं, वहाँ रिक्तियाँ भरी जाएँ:
कई विभागों में शिक्षक नहीं हैं या शिक्षकों की अपर्याप्त संख्या है, जिनमें Sociology & Social Work, Data Science और Defence Studies जैसे क्षेत्र शामिल हैं। एसएफआई मांग करती है कि भर्ती की प्राथमिकताएँ छात्र संख्या, शिक्षण कार्यभार, स्वीकृत पदों और शैक्षणिक आवश्यकता के आधार पर तय हों। यदि किसी विभाग में शिक्षकों की गंभीर कमी है, तो उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए, न कि उसे अनदेखा करके अन्यत्र विज्ञापन निकाले जाएँ। भर्ती का उद्देश्य छात्रों और शैक्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति होना चाहिए — प्रशासनिक सुविधा नहीं।
26. नियुक्ति मामलों में विश्वविद्यालय एकसमान कानूनी रुख क्यों नहीं अपना रहा?
ऐसे मामले हैं जहाँ नियुक्तियाँ माननीय हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की एकल पीठ द्वारा रद्द की गई हैं, जबकि मामले खंडपीठ/LPA में लंबित हैं। एसएफआई विश्वविद्यालय से ऐसे मामलों की वर्तमान स्थिति और प्रत्येक मामले में लिए गए कानूनी व प्रशासनिक निर्णयों का खुलासा मांगती है। यदि विश्वविद्यालय कुछ कर्मचारी-संबंधी मामलों में मुकदमेबाजी जोरदार ढंग से करता है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि अन्य उन मामलों में वह कम आक्रामक क्यों दिखता है, जहाँ नियुक्तियों पर पहले ही न्यायालयीय प्रश्न उठ चुके हैं। विश्वविद्यालय को चयनात्मक दृष्टिकोण अपनाने के बजाय एकसमान, पारदर्शी और कानूनी रूप से टिकाऊ नीति अपनानी चाहिए।
छात्रों के लिए एसएफआई का संदेश:
ये प्रश्न केवल व्यक्तिगत नियुक्तियों या प्रशासनिक निर्णयों के बारे में नहीं हैं। ये HPU के भविष्य, शिक्षा की गुणवत्ता, सार्वजनिक धन के उपयोग और हजारों छात्रों पर डाले जा रहे वित्तीय बोझ से जुड़े हैं।
एसएफआई के छात्रों को यूनिवर्सिटी की यूनिवर्सिटियों और वित्तीय सहयोगियों का सबसे आसान राजस्व स्रोत नहीं मिलेगा। विद्यार्थियों ने नियुक्तियाँ नहीं कीं। चयन प्रक्रियाएं छात्रों ने नहीं रखीं। संदिग्ध खर्च को छात्रों ने मंजूरी नहीं दी। एसोसिएशन का निर्माण या टेंडर दस्तावेज़ तैयार करना छात्रों ने नहीं किया। ऐसे निर्णयों के परिणामस्वरूप छात्रों को बार-बार शुल्क वृद्धि का भार नहीं उठाया जाना चाहिए।
एसफिशिएंसी, इंडिपेंडेंट जांच स्क्रीनिंग, स्केलेमेक्टिक और रिफॉर्मेटिव एक्शन की मांग होती है – कोई किवटी स्कैनर और स्कैनर्स की।