हिम न्यूज़, शिमला। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश मुख्य प्रवक्ता एवं विधायक राकेश जमवाल ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार डीन और रजिस्ट्रार को सौंपने संबंधी आदेश पर उच्च न्यायालय की अंतरिम रोक को लेकर कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक विवाद लगातार बढ़ रहे हैं और उच्च न्यायालय के आदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
राकेश जमवाल ने कहा कि कांग्रेस सरकार को न्यायालय के इन आदेशों से सबक लेना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री सुक्खू के नेतृत्व में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर बार-बार विवाद पैदा हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, शिक्षकों की कमी दूर करने और विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक मामलों को लेकर विवाद समाप्त होने का नाम नहीं ले रहे हैं।
जमवाल ने कहा कि यह कोई पहला मामला नहीं है जब विश्वविद्यालयों के संचालन और नियुक्तियों को लेकर सरकार की नीतियों पर न्यायिक सवाल उठे हों। उन्होंने तीन महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का उल्लेख किया।
पहला, 27 अगस्त 2026 को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कृषि एवं बागवानी विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्तियों से जुड़े राज्य सरकार के संशोधित प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कुलपति नियुक्तियों की प्रक्रिया विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के वर्ष 2018 के नियमों के अनुरूप होनी चाहिए। इस फैसले से पालमपुर स्थित कृषि विश्वविद्यालय और नौणी स्थित बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय की कुलपति नियुक्ति प्रक्रिया प्रभावित हुई।
दूसरा, वर्ष 2025 में कृषि एवं बागवानी विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्तियों को लेकर राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच गंभीर मतभेद सामने आए। कुलाधिपति के रूप में राज्यपाल द्वारा शुरू की गई नियुक्ति प्रक्रिया और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को लेकर विवाद हुआ। राजभवन ने नियुक्ति विज्ञापनों को वापस लेने संबंधी सरकारी पत्र को अमान्य करार दिया था। जमवाल ने कहा कि यह घटनाक्रम सरकार और विश्वविद्यालयों के वैधानिक अधिकारों के बीच पैदा हुए टकराव का उदाहरण है।
तीसरा, अब हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार डीन और रजिस्ट्रार को सौंपने के आदेश पर उच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम रोक लगाए जाने की खबर सामने आई है। जमवाल ने कहा कि यह घटनाक्रम भी विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक निर्णयों की वैधानिकता और प्रक्रियागत पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।
राकेश जमवाल ने कहा कि अगस्त 2026 में प्रदेश विधानसभा ने हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, 2026 भी पारित किया था, जिसका भाजपा ने विरोध किया था। उन्होंने कहा कि भाजपा ने उस समय भी विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता तथा नियुक्तियों और वित्तीय निर्णयों में सरकारी नियंत्रण बढ़ने की आशंका जताई थी। हालांकि सरकार ने दावा किया था कि इस विधेयक से शैक्षणिक स्वायत्तता प्रभावित नहीं होगी।
जमवाल ने कहा कि मुख्यमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि जब विश्वविद्यालयों के संचालन के लिए पहले से अधिनियम, नियम और नियामक व्यवस्थाएं मौजूद हैं, तो सरकार के निर्णय बार-बार विवादों में क्यों आ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जगह प्रशासनिक नियंत्रण को अधिक महत्व दे रही है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्तियों, कार्यभार और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर बार-बार विवाद उत्पन्न होना प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था के हित में नहीं है। इससे विद्यार्थियों, शिक्षकों और शोधार्थियों के बीच अनिश्चितता का वातावरण बन सकता है।
राकेश जमवाल ने कहा कि कांग्रेस सरकार को इन पांच सवालों का जवाब देना चाहिए।
1. उच्च न्यायालय द्वारा कुलपति नियुक्तियों के संशोधित प्रावधान निरस्त किए जाने के बाद सरकार ने क्या सुधारात्मक कदम उठाए?
2. विश्वविद्यालयों की नियुक्ति प्रक्रियाओं को लेकर राजभवन और सरकार के बीच बार-बार मतभेद क्यों उत्पन्न हुए?
3. विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए सरकार की क्या नीति है?
4. शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के रिक्त पदों तथा शैक्षणिक सुविधाओं की कमी दूर करने के लिए क्या समयबद्ध योजना बनाई गई है?
5. विश्वविद्यालयों से जुड़े विवादों के कारण विद्यार्थियों और शैक्षणिक गतिविधियों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, इसके लिए सरकार ने क्या व्यवस्था की है?
जमवाल ने प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अनेक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, शिक्षण संस्थानों के बंद होने अथवा विलय और दूरदराज क्षेत्रों में शैक्षणिक सुविधाओं की उपलब्धता जैसे विषय गंभीर चिंता का कारण बने हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं का स्थायी समाधान करने में विफल रही है।
उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश ने दशकों की मेहनत से शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। प्रदेश के गांव-गांव तक शिक्षा पहुंचाने में अनेक सरकारों, शिक्षकों और समाज का योगदान रहा है। इस उपलब्धि को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को शैक्षणिक संस्थानों में स्थिरता, पर्याप्त संसाधन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
राकेश जमवाल ने कहा कि भाजपा न्यायपालिका और विश्वविद्यालयों की वैधानिक स्वायत्तता का सम्मान करती है। उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश को अंतिम निर्णय के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन सरकार को उससे उठने वाले प्रक्रियागत प्रश्नों का जवाब अवश्य देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू को विश्वविद्यालयों से जुड़े विवादों, नियुक्तियों की पारदर्शिता और प्रदेश की बिगड़ती शिक्षा व्यवस्था पर स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए। भाजपा विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाती रहेगी तथा शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार से जवाबदेही की मांग करती रहेगी।