हिमाचल में हरित ऊर्जा को नई गति, 2,534 मिलियन यूनिट विद्युत उत्पादन और 1004 करोड़ रुपये से अधिक राजस्व किया अर्जित

हिम न्यूज़ शिमला। हिमालय की गोद में बसा हिमाचल प्रदेश देश के प्रमुख जलविद्युत उत्पादक राज्यों में से एक है। यहां की नदियां, पर्वतीय भू-आकृति और प्राकृतिक संसाधन ऊर्जा उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं। वर्तमान में राज्य सरकार पारंपरिक जलविद्युत क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और अन्य नवाचारों के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

प्रदेश सरकार ने ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने, नवीकरणीय स्रोतों का विस्तार करने और स्थानीय समुदायों तक इसके लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से अनेक पहल की हैं। इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं और राज्य की प्रमुख नवीकरणीय परियोजनाओं से लगभग 2,534 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ है। इससे प्रदेश को 1,004 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ है, जो हरित ऊर्जा के क्षेत्र में राज्य की प्रगति को दर्शाता है।

राज्य सरकार ने सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए अगले दो वर्षों में 500 मेगावाट सौर ऊर्जा क्षमता की परियोजनाएं स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस दिशा में ऊना जिला और बिलासपुर जिला में स्थापित पेखुबेला, भंजाल, अघलौर और बैरा डोल सौर परियोजनाएं उल्लेखनीय हैं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 52 मेगावाट है। इन परियोजनाओं से अब तक लगभग 114.27 मिलियन यूनिट विद्युत उत्पादन और 34.83 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ है। यह पहल राज्य के ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।

प्रदेश में सौर ऊर्जा उत्पादन का विस्तार भी तेजी से हो रहा है, फिर भी जलविद्युत परियोजनाएं राज्य की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की आधारशिला बनी हुई हैं। इस संदर्भ में कुल्लू जिला में स्थापित 100 मेगावाट क्षमता की सैंज जलविद्युत परियोजना, किन्नौर जिला में 65 मेगावाट की काशंग चरण-एक परियोजना तथा शिमला जिला में 111 मेगावाट की सावड़ा-कुड्डू परियोजना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इन परियोजनाओं से संयुक्त रूप से लगभग 2,419.97 मिलियन यूनिट विद्युत उत्पादन और 969.95 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ है। इसके अतिरिक्त 13 जलविद्युत परियोजनाओं के पूर्ण होने से राज्य की कुल उत्पादन क्षमता में 1,229 मेगावाट की वृद्धि हुई है, जिससे ऊर्जा अवसंरचना को और मजबूती मिली है।

स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में राज्य सरकार नई तकनीकों को भी अपनाने की दिशा में अग्रसर है। नालागढ़ में एक मेगावाट क्षमता का ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा संयंत्र विकसित किया जा रहा है, जो भविष्य में स्वच्छ ईंधन के रूप में हाइड्रोजन के उपयोग को बढ़ावा देगा। इसी प्रकार नेरी में देश का पहला राज्य समर्थित बायोचार कार्यक्रम प्रारंभ किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत एक बायोचार संयंत्र स्थापित किया जाएगा। यह पहल कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

सौर ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार ने प्रथम आओ-प्रथम पाओ के आधार पर सौर परियोजनाएं आवंटित करने की व्यवस्था लागू की है। इसके अंतर्गत 250 किलोवाट से 5 मेगावाट तक की परियोजनाएं निवेशकों को दी जा रही हैं।  इन परियोजनाओं से उत्पादित बिजली को हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड द्वारा खरीदा जाएगा। अब तक 547 निवेशकों को 595.97 मेगावाट क्षमता की ग्राउंड-माउंटेड सौर परियोजनाएं आवंटित की जा चुकी हैं। हिमऊर्जा के माध्यम से 728.4 मेगावाट क्षमता की सौर परियोजनाएं हिमाचल प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड को आवंटित की गई हैं, जिनमें से 150.13 मेगावाट क्षमता की परियोजनाओं पर कार्य आरंभ हो चुका है।

राज्य सरकार ने दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों में ऊर्जा उपलब्ध करवाने पर भी विशेष ध्यान दिया है। लाहौल स्पीति जिला के काजा क्षेत्र के ऊंचाई वाले गांवों में 148 घरों में सौर ऑफ-ग्रिड प्रणालियां स्थापित की गई हैं, जिससे वहां रहने वाले परिवारों को विद्युत उपलब्ध हो सके। इसी प्रकार पांगी घाटी के हिलोर और धरवास गांवों में 400 किलोवाट क्षमता के बैटरी ऊर्जा भंडारण तंत्र स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि दुर्गम क्षेत्रों में भी निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

ग्रामीण स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के उददेश्य से राज्य सरकार ने ग्रीन पंचायत कार्यक्रम शुरू किया है। इसके अंतर्गत ग्राम पंचायतों में 500 किलोवाट क्षमता के ग्राउंड-माउंटेड सौर संयंत्र स्थापित किए जाएंगे और कुल 150 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना के प्रथम चरण में 24 पंचायतों में परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं और 16 पंचायतों में कार्य प्रारंभ हो चुका है। इस कार्यक्रम की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इन परियोजनाओं से प्राप्त राजस्व का 20 प्रतिशत हिस्सा संबंधित पंचायतों में अनाथ बच्चों और विधवाओं के आर्थिक सहयोग के लिए उपयोग किया जाएगा, जिससे हरित ऊर्जा के साथ सामाजिक कल्याण को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

जलविद्युत परियोजनाओं से प्रभावित क्षेत्रों और परिवारों के हितों की रक्षा के लिए राज्य सरकार ने 25.25 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता भी प्रदान की है। इसके साथ ही लघु जलविद्युत परियोजनाओं में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए 25 मेगावाट तक की परियोजनाओं पर राज्य को मिलने वाली मुफ्त बिजली की रॉयल्टी दर को 18 और 30 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत कर दिया गया है। इस नीति परिवर्तन से निजी निवेश को बढ़ावा मिलने की संभावना है।

ऊर्जा क्षेत्र में राज्य को एक महत्त्वपूर्ण कानूनी सफलता भी प्राप्त हुई है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने कड़छम-वांगतू जलविद्युत परियोजना के रॉयल्टी विवाद में हिमाचल प्रदेश के पक्ष में निर्णय दिया। इस निर्णय के अनुसार जेएसडब्लू ऐनर्जी को 1,045 मेगावाट क्षमता की परियोजना पर राज्य को दी जाने वाली रॉयल्टी को 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत करना होगा। इस निर्णय से राज्य को प्रति वर्ष लगभग 150 करोड़ रुपये अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होने की संभावना है।

वर्तमान में राज्य की वार्षिक विद्युत खपत लगभग 13,000 मिलियन यूनिट आंकी गई है और औद्योगिक विकास तथा विद्युत वाहनों के बढ़ते उपयोग के कारण भविष्य में ऊर्जा की मांग और बढ़ने की संभावना है। इस परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का 90 प्रतिशत से अधिक भाग नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। जलविद्युत क्षमता को सुदृढ़ करने, सौर ऊर्जा का विस्तार करने तथा हरित हाइड्रोजन और बायोचर जैसी नई तकनीकों को अपनाने के माध्यम से हिमाचल प्रदेश देश में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की दिशा में एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।