वर्ष 2025 में ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां

हिम न्यूज़। ऊर्जा से जुड़े सुधार शायद ही कभी एक ही झटके में शोर-शराबे के साथ किए जाते हैं। इन सुधारों को  कानूनों में बदलाव, आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाने, संस्थानों के उन्नयन और क्षमता में विस्तार के जरिए चुपचाप अंजाम दिया जाता है। वर्ष 2025 में ऊर्जा से जुड़ी भारत की कहानी इसी श्रेणी में आती है: यह एक ऐसा वर्ष रहा जहां विद्युत, आण्विक ऊर्जा, स्वच्छ बदलाव और रणनीतिक पदार्थ से संबंधित बहुप्रतीक्षित सुधार आखिरकार एक साथ लागू हुए।

इस पृष्ठभूमि में, 2008 में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ हुए असैन्य परमाणु समझौते और उसे एक कूटनीतिक सफलता के तौर पर सराहे जाने को याद करना जरूरी है। संसद में इस पर जोरदार बहस हुई थी। तत्कालीन यूपीए सरकार ने इसे लोकप्रिय बनाया और देशवासियों को बताया गया कि भारत ने आखिरकार दशकों के आण्विक क्षेत्र में अलगाव से मुक्ति पा लिया है। फिर भी,  इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि कांग्रेस के काल में जमीनी स्तर पर ज्यादा कुछ नहीं बदला।

भारत का आण्विक क्षेत्र  प्रतिबंधात्मक दायित्व कानूनों से बंधा रहा,  निजी हिस्सेदारी के लिए बंद रहा और 1960 के दशक के कानूनी ढांचे में फंसा रहा। इस समझौते ने, जिससे अंतरराष्ट्रीय पहुंच मिलने की उम्मीद थी, आखिरकार भारत को अधर में लटका दिया। इस विरोधाभास से यह स्पष्ट होता है कि 2025 क्यों अहम है। 17 साल बाद, भारत ने आण्विक कूटनीति के प्रतीकवाद को दोहराया नहीं, बल्कि उसने इस संधि के बाद हुई संरचनात्मक अनदेखी को दुरुस्त किया। वर्ष 2025 में किए गए सुधारों का मतलब सिर्फ महत्वाकांक्षाओं की घोषणा करना भर नहीं है, बल्कि इसका संबंध उन प्रणालियों को नए सिरे से डिजाइन करने से है जो 4-ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। अतीत दिक्कतों को रेखांकित करता है, लेकिन वर्तमान नतीजे दे रहा है।

आण्विक ऊर्जा: लंबे इंतजार की समाप्ति

वर्ष 2025 का सबसे महत्वपूर्ण सुधार आण्विक ऊर्जा के क्षेत्र में हुआ है। शांति विधेयक के पारित होने के साथ, भारत ने आखिरकार उस ढांचे को समाप्त कर दिया जिसने छह दशकों से अधिक समय से असैन्य परमाणु क्षेत्र में उसकी प्रगति को रोक रखा था। वर्षों तक, आण्विक ऊर्जा जरूरत के अभाव की वजह से हाशिए पर नहीं रही, बल्कि दायित्व संबंधी पुराने नियम और नियामक संबंधी अस्पष्टता ने इसके विस्तार को लगभग असंभव सा बना दिया था।

शांति विधेयक के जरिए किए गए सुधार की खासियत सिर्फ परमाणु क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलना भर ही नहीं, बल्कि विकास को संभव बनाने का तरीका भी है। दायित्व संबंधी नियमों को अद्यतन करके और जवाबदेही को स्पष्ट करके, यह सुधार आण्विक क्षमता को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित तरीके से और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बढ़ाने की अनुमति देता है।

दुनिया भर में, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश आण्विक ऊर्जा के मामले में स्वामित्व के अलग-अलग मॉडल पर निर्भर हैं। इनमें सार्वजनिक निगरानी को निजी क्षेत्र द्वारा कार्यान्वयन के साथ जोड़ा जाता है। भारत के सुधार भी इसी दिशा में हैं, जिन्हें घरेलू सुरक्षा और नियामक संबंधी जरूरतों के हिसाब से ढाला गया है। यह अविनियमन (डीरेगुलेशन) नहीं है। यह एक अनुशासित शुरुआत है, जहां  विस्तार कमजोर निगरानी के बजाय उच्च सुरक्षा मानकों से जुड़ा है।

यह कानून 2047 तक घरेलू एवं विदेशी निजी निवेशकों से परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में 100 – 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर की नई पूंजी को आकर्षित करेगा, जिससे परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में 12-14 गुना बढ़ोतरी होगी और जैव ईंधन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी।

यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि नवीकरणीय ऊर्जा जरूरी तो है, लेकिन वह ग्रिड में अस्थिरता लाती है। जैसे-जैसे सौर और पवन ऊर्जा का तेजी से विकास हो रहा है, स्वच्छ एवं भरोसेमंद बेसलोड वाली बिजली की जरूरत अपरिहार्य हो जाती है। परमाणु ऊर्जा इस कमी को पूरा करती है। वर्ष 2025 में, भारत ने प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर परमाणु ऊर्जा को ऊर्जा के एक संतुलित एवं सुरक्षित युग्म के हिस्से के रूप में विकसित होने में समर्थ बनाया।

महत्वपूर्ण खनिज: हाशिए से हटकर केन्द्र में

हाल तक,  भारत में ऊर्जा से संबंधित विमर्श में महत्वपूर्ण खनिजों का उल्लेख शायद ही कभी होता था। लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और दुर्लभ मृदा तत्वों को रणनीतिक रूप से नाजुक के बजाय खरीद की दृष्टि से समस्याजनक माना जाता था। ऊर्जा संबंधी बदलावों के बारे में चर्चा सामग्रियों की दृष्टि से नहीं, बल्कि मेगावाट के संदर्भ में होती थी। आत्मसंतुष्टि का यह भाव तब खत्म हुआ, जब वैश्विक आपूर्ति  में आए रुकावटों ने यह दिखलाया कि स्वच्छ तकनीक कुछ चुनिंदा आपूर्ति श्रृंखला पर किस कदर निर्भर हैं।

वर्ष 2025 में, उस कमी को निर्णायक रूप से दूर किया गया। नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन एक रणनीतिक बदलाव है।  इस मिशन को लगभग 32,000 करोड़ रुपये की सरकारी फंडिंग और निवेश प्रतिबद्धताओं का समर्थन हासिल है। यह मिशन विद्युत आधारित आवागमन, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा के लिए आवश्यक 24 प्रमुख खनिजों को लक्षित है। इसका दायरा जानबूझकर व्यापक रखा गया है और इसमें घरेलू अन्वेषण, विदेशी साझेदारी, प्रसंस्करण,  पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग), कौशल और प्रौद्योगिकी विकास शामिल हैं।

सबसे अहम बात यह है कि यह मिशन सिर्फ निष्कर्षण तक ही सीमित नहीं है। यह स्पष्ट तौर पर डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और मैन्यूफैक्चरिंग संबंधी क्षमताओं पर ध्यान देता है, जिससे कच्चे माल के साथ इसके निर्यात बजाय इसका मूल्यवर्धन देश में ही होना सुनिश्चित होता है। इससे उस पुरानी कमी को दूर किया जा सकेगा, जहां भारत संसाधनों का खनन तो करता था, लेकिन तैयार घटकों  का आयात करता था।

इस प्रयास के केन्द्र में दुर्लभ मृदा आधारित स्थायी चुंबक से संबंधित घरेलू क्षमता निर्माण की 7,280 करोड़ रुपये की पहल है। ये घटक ईवी ड्राइवट्रेन, विंड टर्बाइन, सटीक एयरोस्पेस प्रणाली और उन्नत रक्षा प्लेटफॉर्म के लिए बेहद जरूरी हैं। अब तक, भारत कुछ वैश्विक कंपनियों के वर्चस्व वाली आपूर्ति श्रृंखला से होने वाले आयात पर बहुत अधिक निर्भर रहा है। यहां घरेलू क्षमता का निर्माण कोई छोटी-मोटी नीति  नहीं है; यह एक रणनीतिक सुरक्षा है।

एक मौन लेकिन परिवर्तनकारी नियामक संबंधी सुधार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वर्ष 2025 का खान एवं खनिज संबंधी संशोधन में “एक पट्टा, अनेक खनिज” के सिद्धांत समावेश है, जिससे मौजूदा खनन पट्टाधारक बिना किसी नई रॉयल्टी या प्रक्रिया में बदलाव के नए खोजे गए महत्वपूर्ण खनिजों को जोड़ सकते हैं। इसका नतीजा यह होगा कि खोज में तेजी आएगी, मौजूदा खानों का बेहतर इस्तेमाल होगा, और स्वच्छ तकनीक की मूल्य श्रृंखला में इनपुट लागत कम होगी। कुल मिलाकर, ये कदम ऊर्जा संबंधी बदलावों की बातों से हटकर औद्योगिक संप्रभुता की दिशा में एक बदलाव को संभव बनाते हैं। भारत अब भविष्य का आयात करके संतुष्ट नहीं है। वर्ष 2025 में, उसने भविष्य को सुरक्षित करना शुरू कर दिया।

कमी के प्रबंधन से प्रणाली के डिजाइन तक

भारत में बिजली के क्षेत्र में एक समय बिजली की कमी इतनी अधिक थी कि यह वैश्विक स्तर पर  सुर्खियों में आ गई थी। जुलाई 2012 में, दुनिया ने भारत के इतिहास के सबसे बड़े ब्लैकआउट में से एक को देखा, जिससे करोड़ों लोग प्रभावित हुए। यह घटना कोई एक बार होने वाला हादसा नहीं था। इसने गहरी संरचनात्मक खामियों को उजागर किया: आर्थिक रूप से कमजोर वितरण कंपनियां, गलत मूल्य निर्धारण, नेटवर्क में कम निवेश और एक ऐसी प्रणाली जो सांस्थानिक अनुशासन के बजाय प्रशासनिक नियंत्रण से संचालित थी। यही विरासत अब वर्तमान में जारी सुधार के पैमाने को परिभाषित कर रही है।

विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 सीधे तौर पर इस कमजोरी को दूर करता है। 2003 के बिजली अधिनियम पर आधारित यह सुधार वितरण में प्रतिस्पर्धा, नेटवर्क के आधुनिकीकरण और सेवा की गुणवत्ता पर फोकस करता है। इसका मुख्य विचार सरल है: किफायती बिजली की सुविधा को अक्षमता के बूते बनाए नहीं रखा जा सकता। इसे बेहतर बुनियादी ढांचे, कम तकनीकी नुकसान और वित्तीय अनुसाशन के जरिए ही सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

सबसे जरूरी बात यह है कि किसानों और कमजोर परिवारों के लिए लक्षित सुरक्षा उपाय वैसे ही कायम  हुए हैं। यह बदलाव का संबंध समर्थन वापस लेने से नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने से है कि समर्थन एक आर्थिक रूप से टिकाऊ प्रणाली पर आधारित हो। बिजली सुधार को आखिरकार अब कल्याणकारी प्रबंधन, बल्कि आर्थिक अवसंरचना के तौर पर देखा जा रहा है।

नवीकरणीय ऊर्जा:  ऊंचा पैमाना और विश्वसनीयता

यहां तक ​​कि नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में भी,  दृष्टिकोण संकुचित  के बजाय समग्र रहा है। बड़े सौर पार्क एवं पवन कॉरिडोर से लेकर किसानों के लिए पीएम सूर्य घर रूफटॉप सोलर एवं पीएम-कुसुम जैसी योजनाओं के जरिए विकेन्द्रित तरीके से अपनाने तक, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार एक साथ घरों, खेती और उद्योगों तक पहुंचा है। इसी व्यापकता की वजह से बिना बिखराव के बड़े पैमाने पर काम हो पाया है।

2025 में भारत की नवीकरणीय ऊर्जा की कहानी अब महज एक सपना भर नहीं रही। अब कहानी सपने को साकार करने की है। 2025 के मध्य तक, भारत दुनिया के नवीकरणीय ऊर्जा के प्रमुख उत्पादक देशों में शामिल हो गया है: यह नवीकरणीय ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता के मामले में दुनिया भर में चौथे स्थान पर, पवन ऊर्जा के मामले में चौथे और सौर ऊर्जा के मामले में तीसरे स्थान पर है। 2014 से नवीकरणीय ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता लगभग तीन गुना हो गई है, जबकि सौर क्षमता लगभग चालीस गुना बढ़ गई है।

पैमाने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हासिल की गई उपलब्धियां है। भारत ने अपने मूल पेरिस जलवायु प्रतिबद्धताओं को तय समय से कई वर्ष पहले ही पूरा कर लिया है। अब स्थापित की गई बिजली क्षमता का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा गैर- जैव संसाधनों से आता है, जो 2030 के लक्ष्य से अधिक है। जबकि जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता 2005 के स्तर से काफी कम हो गई है। इस समय से पहले अर्जित उपलब्धि  ने भारत को अपनी महत्वाकांक्षा को कम करने के बजाय और आगे बढ़ाने की अनुमति दी है। अतीत के साथ तुलना करने के लिए किसी अतिश्योक्ति की जरूरत नहीं है। पहले के प्रयास सिर्फ इरादों  और प्रतीकों तक ही सीमित थे। 2025 में, भारत ने निर्णायक रूप से अमल करने की दिशा में कदम बढ़ाया।